Namard

उस रात मैंने चाय नहीं, कॉफी बनाई; एकदम कड़क।
मैं सारी रात सो ही नहीं पाया, यही सोचता रहा कि; "मैं नामर्द होता तो अच्छा होता। अगर मैं नामर्द होता या में समलैंगिक होता, तो शायद औरतें, लड़कियां, बहनें मुझसे बात करने में झिझकती नहीं, मुझसे मदद मांगने से पहले अपना पल्लू ठीक नहीं करती, मुझे देखकर अपने बैठने का सलीका नहीं बदलती। अगर मूछों पर ताव देकर बगल से गुजरती औरत को हीन नजरो से देखना और ओछी हरकते करना मर्दों का काम है, मर्दानगी है, तो में नामर्द या समलैंगिक होता तो अच्छा होता। लोग नशे में इज्जत से खेल जाते हैं, और जान भी ले लेते है, और अगर मुझसे भी ऐसा हो सकता है, तो अच्छा होता कि में नामर्द या समलैंगिक होता।
उस रात मेरे आंखों में आसूं नहीं थे, पर मेरी आत्मा चीख-चीख कर रो रही थी, और दर्द बस इस बात का है कि उस चीख को सुनने वाला और उस दर्द को समझने वाला कोई नहीं था।

Comments

Popular posts from this blog

I Know The Pain

The Photograph

Zindagi aa baith, ek baat bta....