The Photograph
'हमेशा की तरह उस शनिवार भी वो पलकें झुकाए घाट किनारे बैठ कर हमारी राह तक रहीं थीं। और हमेशा की तरह ये सब मैं दूर से देख रहा था और ये देख कर मुझे ऐसा लग रहा था मानो किसी कोयल को सावन का इंतजार है।
फिर मैं उधर से दो पूर्वे में चाय ले कर आया और जान बूझ कर एक पूर्वा गिरा कर ये दिखाया कि गलती से गिर गया और उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे उन्हें ये पता था कि एक पूर्वा टूटने वाला है। फिर एक मायूस सा चेहरा बना कर मैंने उन्हें दूसरा पूर्वा पकड़ा दिया। उन्होंने धूप में हो रही बारिश में भींगे हुए बेल की पत्तियों जैसे अपने होठों से पूर्वे को लगाया और चाय की चुस्कियां भरने लगी और ये देख कर हमारा गला सुख रहा था। फिर मुझे बहुत देर तक ऐसे तड़पाने के बाद अंततः उन्होंने अपने पूर्वे को हमारी तरफ आगे बढ़ाया और मैंने लपक कर वो पूर्वा पकड़ लिया। उस पूर्वे की उपरी सतह पर उनके होठों के निशान ऐसे लग रहे थे मनों किसी सदियों से सुखी पड़ी बंजर ज़मीन पर घनघोर बारिश हुई हो जिसकी वजह से उसकी रूखी दरख़्तों में हल्की नमी सी आ गई थी और उसकी महक और भी सौंधी सी हो गई थी जिसके सुगंध मात्र से ही मेरा जी आनंदित हो गया फिर मैने बिना विलंब के अपने होठों को उनके होठों से लगाकर चाय खत्म की। और ऐसा हर शनिवार को होता था। एक रोज़ मैंने उनसे कहा कि क्या मैं आपकी एक तस्वीर खींच लू और उन्होंने कहा कि हां। क्यों नहीं? पर वादा करो कि इस तस्वीर को हमेशा अपने पास रखोगे'।
इतना कहते ही दादाजी की आवाज़ लड़खड़ा गई और उनकी आंखे नम हो गई। फिर उन्होंने आंशुओ को छुपाते हुए कहा कि जल्दी से इस तस्वीर पर फूलों की माला चढ़ा दे, और भी मेहमान आते होंगे।
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